Sunday, April 19, 2026

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इंद्रधनुषीय संस्कृति : विविधता की प्रतीक तीन झलकियां

भारत की सांस्कृतिक विरासत इतनी व्यापक और विविधतापूर्ण है कि हर कोना, हर समुदाय और हर पर्व एक अलग रंग में सजी अनूठी कहानी कहता है। इस इंद्रधनुषीय संस्कृति की तीन झलकियां — संथाल समुदाय की पहचान, जगन्नाथ पुरी की रथयात्रा और कामाख्या धाम का अंबुबाची मेला — भारतीय विविधता की जीवंत मिसाल हैं।

संथाल : जंगल से जनजीवन तक का सफर

    कभी जंगलों में स्वतंत्र रूप से घूमने वाले संथाल आज अपनी 12 गोत्रों की परंपरा के साथ व्यवस्थित जीवन जी रहे हैं। इन गोत्रों की पहचान केवल एक सामाजिक ढांचा नहीं, बल्कि उनके इतिहास, प्रकृति से संबंध और पारंपरिक ज्ञान की प्रतीक हैं।
    संथाल लोक गीतों, नृत्य, लकड़ी पर नक्काशी और प्रकृति-पूजन के लिए प्रसिद्ध हैं। इनका जीवन जंगल, जमीन और जल से गहराई से जुड़ा हुआ है। गोत्रों के माध्यम से वे अपने वंश और सांस्कृतिक पहचान को गर्व के साथ संजोए हुए हैं।

    पुरी की रथयात्रा : भक्ति का उत्सव

      ओडिशा के जगन्नाथ पुरी में हर साल होने वाली 12 दिवसीय रथयात्रा न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह भारत की धार्मिक एकता और जनसामान्य की सहभागिता की अद्वितीय झलक भी प्रस्तुत करती है।
      भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की विशाल रथों पर सवारी और सड़कों पर उमड़ती लाखों की भीड़ — यह सब एक दिव्य माहौल रचते हैं। यह पर्व जाति, भाषा और वर्ग से परे सभी को जोड़ता है।

      कामाख्या का अंबुबाची मेला : शक्ति की आराधना

        असम के कामाख्या धाम में हर साल लगने वाला अंबुबाची मेला स्त्रीत्व, शक्ति और उपासना का उत्सव है। यह पर्व मां कामाख्या के मासिक ऋतुकाल का प्रतीक है, जिसे जीवन सृजन की शक्ति के रूप में पूजा जाता है।
        तीन दिनों तक मंदिर के पट बंद रहते हैं और चौथे दिन पुनः खुलते हैं, जिसे “महाप्रसाद” पाने का शुभ अवसर माना जाता है। देश-विदेश से श्रद्धालु यहां आते हैं और देवी की शक्ति के प्रति नतमस्तक होते हैं।

        भारत की संस्कृति किसी एक रूप में नहीं सिमटी है — वह संथालों की परंपरा में है, जगन्नाथ की रथयात्रा की भीड़ में है, और कामाख्या की रहस्यमयी साधना में भी। यह इंद्रधनुषीय संस्कृति ही भारत की पहचान है, जो विविधता में एकता का वास्तविक उदाहरण है।

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        Pranaykumar Bandi

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