Assurances or Concrete Action? Indefinite Hunger Strike Continues for 11th Day
विहार परिसर में भिक्खु रत्नमणि थेरो का आंदोलन, नगर परिषद और निजी कंपनी की भूमिका पर उठ रहे सवाल
प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस/चंद्रपुर : घुग्घुस के शांति नगर स्थित बोधिसत्व बुद्ध विहार व ध्यान साधना केंद्र परिसर में भिक्खु रत्नमणि थेरो का आमरण उपोषण 7 अगस्त 2026 को दोपहर 3 बजे से शुरू हुआ। आंदोलनकारियों के अनुसार, नगर परिषद और संबंधित निजी कंपनी की ओर से उनकी प्रमुख मांगों पर अब तक कोई ठोस एवं लिखित निर्णय नहीं दिया गया है। गुरुवार को उपोषण का 11वां दिन होने के बावजूद आंदोलन समाप्त होने के आसार दिखाई नहीं दे रहे हैं।
इस मामले ने अब केवल एक विहार परिसर के विवाद का रूप नहीं रखा, बल्कि नगर परिषद की कार्यप्रणाली, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

आंदोलनकारियों का आरोप है कि बार-बार आश्वासन दिए जा रहे हैं, लेकिन जमीन पर ठोस कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही। उनका कहना है कि यदि मांगों पर प्रशासन और संबंधित कंपनी का स्पष्ट निर्णय है, तो उसे लिखित रूप में सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा? यही सवाल अब आंदोलन स्थल से लेकर शहर की राजनीतिक चर्चाओं तक पहुंच गया है।
आश्वासन बहुत, लिखित जवाब कहां?
आंदोलन स्थल पर राजनीतिक पदाधिकारियों और अधिकारियों की आवाजाही के बावजूद विवाद का स्थायी समाधान नहीं निकलने पर आंदोलनकारियों में नाराजगी है। उनका आरोप है कि जिम्मेदारी तय करने के बजाय एक-दूसरे की ओर उंगली उठाने की स्थिति दिखाई दे रही है।
सोशल मीडिया पर सामने आ रहे वीडियो और बयानों को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि “आश्वासन पर आश्वासन” दिए जा रहे हैं, लेकिन जब आधिकारिक लिखित आदेश या निर्णय की बात आती है तो स्थिति स्पष्ट नहीं होती।
यही वजह है कि अब सवाल सीधे प्रशासन से पूछा जा रहा है—क्या आश्वासन ही अंतिम निर्णय है, या फिर आंदोलनकारी की मांगों पर कोई बाध्यकारी और लिखित कार्रवाई भी होगी?
आमरण उपोषणकारी को हटाने की कोशिश पर भी सवाल
आंदोलनकारियों के अनुसार, भिक्खु रत्नमणि थेरो को उपोषण स्थल से हटाने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में आंदोलनकारियों का सवाल है कि यदि प्रशासन के पास समाधान का रास्ता मौजूद है तो उपोषण समाप्त कराने से पहले मांगों का लिखित समाधान क्यों नहीं दिया जा रहा?
यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि जिस प्रभाग में आंदोलन चल रहा है, वहां के स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका क्या है और उन्होंने इस विवाद के समाधान के लिए अब तक क्या ठोस पहल की है?
हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित नगर परिषद, निजी कंपनी और जनप्रतिनिधियों का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है। उनका पक्ष मिलने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाना चाहिए।
तीन प्रमुख मांगों पर टिकी लड़ाई, भिक्खु रत्नमणि थेरो के आंदोलन से जुड़ी प्रमुख मांगों में—
- बौद्ध विहार के सामने की सड़क को विहार के उपयोग के लिए उपलब्ध/मुक्त किया जाए।
- नगर परिषद द्वारा जारी की गई NOC रद्द की जाए।
- बौद्ध विहार परिसर को स्थायी रूप से विहार समिति को सौंपा जाए।
इन मांगों को लेकर आंदोलन जारी है। अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि संबंधित प्रशासन इन मांगों पर क्या निर्णय लेता है।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर उठ रहे सवाल
घुग्घुस शहर के इस आंदोलन ने स्थानीय राजनीति के सामने भी कई सवाल खड़े कर दिए हैं। विधायक, सांसद, नगराध्यक्ष, सभापति, नगरसेवक, नगरसेविका और संबंधित अधिकारियों की भूमिका को लेकर आंदोलनकारियों तथा स्थानीय नागरिकों में चर्चा है।
जनता को आश्वासन नहीं, निर्णय चाहिए।
आंदोलनकारी को बयान नहीं, लिखित आदेश चाहिए।
और प्रशासन से सवाल है—आखिर इस विवाद का स्थायी समाधान कब होगा?
11 दिन से जारी आमरण उपोषण के बावजूद यदि केवल आश्वासनों का दौर चलता रहा, तो यह प्रशासनिक प्रक्रिया और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही दोनों पर गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि बोधिसत्व बुद्ध विहार की मांगों का लिखित समाधान निकलता है या भिक्खु रत्नमणि थेरो का यह संघर्ष भी आश्वासनों और राजनीतिक चर्चाओं तक सीमित होकर रह जाता है।




