प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : प्रभाग क्रमांक 11 के उड़िया मोहल्ला स्थित सार्वजनिक शौचालय के नूतनीकरण में कथित अनियमितताओं और बदहाल स्थिति को लेकर प्रकाशित समाचार के बाद पूरे क्षेत्र में राजनीतिक और प्रशासनिक हलचल तेज हो गई है। जहां एक ओर नागरिक मूलभूत सुविधाओं की मांग को लेकर आवाज बुलंद कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर क्षेत्र में ऐसी चर्चाएं भी जोर पकड़ रही हैं कि मुद्दा उठाने वाले लोगों पर दबाव बनाया जा रहा है ताकि मामला आगे न बढ़े।
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेजी से फैल रही है कि शौचालय की दुर्दशा, स्वीकृत निधि और अधूरे कार्यों को लेकर सवाल उठाने वाले कुछ नागरिकों को हस्तक्षेप न करने की सलाह दी जा रही है। कुछ लोगों का यह भी दावा है कि विरोध करने वालों को कथित रूप से डराने-धमकाने का प्रयास किया जा रहा है। यदि इन चर्चाओं में जरा भी सच्चाई है तो यह केवल एक शौचालय का मामला नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर विषय बन जाता है।
गौरतलब है कि महाराष्ट्र शासन के सार्वजनिक बांधकाम विभाग क्रमांक-1, चंद्रपुर द्वारा 14 अगस्त 2024 को उड़िया मोहल्ला स्थित सार्वजनिक शौचालय के नूतनीकरण के लिए 5 लाख 98 हजार 892 रुपये की राशि स्वीकृत किए जाने की जानकारी सामने आई थी। इसके बावजूद क्षेत्र के नागरिकों का आरोप है कि आज भी शौचालय की स्थिति अत्यंत खराब है और लोग मूलभूत सुविधा से वंचित हैं।
नागरिकों के अनुसार परिसर में पानी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है, नियमित सफाई नहीं होती, नालियां गंदगी और गाद से भरी हैं तथा आसपास झाड़ियां उग आई हैं। स्थिति ऐसी है कि कई लोगों को आज भी खुले में शौच जाने की मजबूरी झेलनी पड़ रही है। स्वच्छ भारत, स्वास्थ्य सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन जैसे सरकारी दावों के बीच यह तस्वीर कई सवाल खड़े कर रही है।
खबर सामने आने के बाद क्षेत्र में एक और चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। बताया जा रहा है कि नगर परिषद प्रशासन की कथित निष्क्रियता और अधूरे विकास कार्यों पर सवाल उठाने वालों पर उल्टे विभिन्न प्रकार के आरोप लगाने की कोशिश की जा रही है। कुछ लोगों का कहना है कि मुद्दा उठाने वालों पर कथित रूप से “खंडनी मांगने” जैसे आरोप लगाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जनमानस में इसे उस कहावत से जोड़कर देखा जा रहा है — “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे”।
स्थानीय नागरिकों का स्पष्ट कहना है कि यदि कार्य नियमानुसार और पारदर्शी तरीके से हुआ है तो संबंधित विभाग, जनप्रतिनिधि और ठेकेदार सार्वजनिक रूप से स्वीकृत इस्टीमेट, किए गए कार्यों का विवरण तथा खर्च का पूरा लेखा-जोखा जनता के सामने रखें। इससे सभी शंकाओं का समाधान हो जाएगा और अनावश्यक विवाद भी समाप्त हो जाएगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नगर परिषद चुनावों के दौरान विकास, स्वच्छता और जनसुविधाओं के बड़े-बड़े वादे किए गए थे। ऐसे में यदि लाखों रुपये मंजूर होने के बावजूद नागरिकों को शौचालय जैसी बुनियादी सुविधा नहीं मिल पा रही है, तो जनता का सवाल पूछना पूरी तरह जायज है। लोकतंत्र में जनता द्वारा जवाबदेही मांगना कोई अपराध नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की जिम्मेदारी तय करने का संवैधानिक अधिकार है।
वार्डवासियों ने मांग की है कि स्वीकृत इस्टीमेट के अनुसार शौचालय नूतनीकरण का शेष कार्य तत्काल पूरा किया जाए, पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए तथा यदि किसी स्तर पर लापरवाही, अनियमितता या वित्तीय गड़बड़ी पाई जाती है तो जिम्मेदार अधिकारियों, ठेकेदारों और संबंधित व्यक्तियों पर कठोर कार्रवाई की जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब लगभग छह लाख रुपये की मंजूरी का दावा किया जा रहा है, तो जमीन पर बदहाली क्यों दिखाई दे रही है? और यदि नागरिक केवल अपने अधिकारों की बात कर रहे हैं, तो फिर उन्हें चुप कराने की कोशिश किसलिए?
फिलहाल नगर परिषद प्रशासन, संबंधित विभागों और जनप्रतिनिधियों की आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि उड़िया मोहल्ला का यह मामला अब केवल एक सार्वजनिक शौचालय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पारदर्शिता, जवाबदेही और जनहित से जुड़ा बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।




