प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : नगर परिषद घुग्घुस चुनाव 2025 में आरक्षित वर्ग से निर्वाचित हुए कुछ उम्मीदवारों ने चुनाव के दौरान और उसके बाद निर्धारित समयसीमा में जाति वैधता (वैलेडिटी) प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने का आश्वासन दिया था। अब 20 जून 2026 को छह महीने की अवधि पूरी होकर सातवें महीने की शुरुआत होने जा रही है। ऐसे में शहर की राजनीतिक गलियों में वैलेडिटी का मुद्दा फिर से चर्चा के केंद्र में आ गया है।
सूत्रों के अनुसार, अब तक लगभग सात नगर सेवक एवं नगरसेविकाएं अपना वैलेडिटी प्रमाणपत्र नगर परिषद कार्यालय में जमा कर चुके हैं, जबकि करीब छह निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा अभी तक दस्तावेज जमा नहीं किए जाने की चर्चा राजनीतिक और सामाजिक हलकों में जोरों पर है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।
इसी बीच शहर में तरह-तरह की चर्चाओं का बाजार भी गर्म है। कुछ लोगों का दावा है कि वैलेडिटी प्रक्रिया के दौरान वंशावली, पारिवारिक संबंधों, धार्मिक पहचान तथा शैक्षणिक दस्तावेजों को लेकर गंभीर प्रश्न उठाए जा रहे हैं। कहीं मृत पूर्वजों के नामों को लेकर विवाद की चर्चा है तो कहीं कथित रिश्तेदारी और दस्तावेजी विसंगतियों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने भी संबंधित दस्तावेजों की जांच कर निष्पक्ष निर्णय लेने की मांग की है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि भविष्य में किसी भी वैलेडिटी प्रमाणपत्र को लेकर न्यायालय में विवाद उत्पन्न होता है, तो केवल संबंधित जनप्रतिनिधि ही नहीं बल्कि प्रक्रिया से जुड़े अधिकारी, जांच एजेंसियां और चुनावी तंत्र भी कानूनी जांच के दायरे में आ सकते हैं। हालांकि यह पूरी तरह भविष्य की संभावनाओं और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
शहर में यह चर्चा भी तेज है कि कुछ शिकायतकर्ताओं द्वारा अधिकारियों के समक्ष आपत्तियां दर्ज कराई गई थीं। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि कुछ मामलों में शिकायतों को अपेक्षित गंभीरता से नहीं लिया गया, जबकि कुछ शिकायतकर्ताओं को अतिरिक्त दस्तावेज प्रस्तुत करने के पत्र भेजे गए। इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन इन आरोपों ने प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वैलेडिटी प्रक्रिया केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाएगी या फिर हर दस्तावेज की गहराई से जांच होगी? क्या सभी निर्वाचित प्रतिनिधि समयसीमा के भीतर आवश्यक प्रमाणपत्र प्रस्तुत कर पाएंगे? और यदि नहीं, तो क्या कानून अपना रास्ता तय करेगा?
घुग्घुस की राजनीति फिलहाल शतरंज की बिसात बन चुकी है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की नजरें वैलेडिटी प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि आने वाले दिनों में वैलेडिटी का मुद्दा नगर परिषद की सत्ता संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
फिलहाल जनता, प्रशासन, चुनाव आयोग और वैलेडिटी जांच तंत्र की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देख रही है। आने वाले कुछ सप्ताह यह तय कर सकते हैं कि यह मामला केवल चर्चा तक सीमित रहेगा या फिर घुग्घुस की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत करेगा।
सवाल जो शहर पूछ रहा है…
छह महीने की समयसीमा पूरी होने के बाद कितने प्रतिनिधियों ने वैलेडिटी जमा की? लंबित मामलों की वास्तविक स्थिति क्या है? शिकायतों और आपत्तियों पर क्या कार्रवाई हुई? क्या सभी मामलों में समान मापदंड अपनाए गए? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या कानून और लोकतंत्र दोनों की कसौटी पर पूरी प्रक्रिया खरी उतरेगी?
घुग्घुस में फिलहाल एक ही चर्चा है — “वैलेडिटी का फैसला केवल दस्तावेजों का नहीं, बल्कि राजनीतिक भविष्य का भी फैसला साबित हो सकता है।”




