स्ट्रीट लाइट के मुद्दे पर घिरता सत्ता पक्ष, नगर परिषद की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : चुनाव के समय राजनीतिक दलों और अधिकृत उम्मीदवारों द्वारा जनता के सामने बड़े-बड़े वादे रखे जाते हैं। विकास, सुविधा और पारदर्शिता के दावे करते हुए आकर्षक “जाहिरनामे” जारी किए जाते हैं, लेकिन जब वही वादे जमीनी हकीकत से टकराते हैं, तब सवाल सिर्फ राजनीति पर नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे पर खड़े होने लगते हैं।
स्थानीय स्तर पर जारी एक सत्ता पक्ष के जाहिरनामे में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि “शहरातील सर्व प्रमुख मार्गावर स्ट्रीट लाईट लावण्यात येईल।” यानी शहर के प्रमुख मार्गों पर स्ट्रीट लाइट लगाने का वादा जनता से किया गया था। लेकिन अब आम नागरिकों के बीच चर्चा यह है कि चुनावी घोषणा और वास्तविक काम के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है।
शहर के कई वार्डों में आज भी इलेक्ट्रिक पोल खड़े हैं, लेकिन उन पर रोशनी नहीं है। मुख्य सड़कों से लेकर अंदरूनी बस्तियों तक अंधेरे की समस्या लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है। नगर परिषद कार्यालय परिसर में मासिक बैठकों से पहले विपक्ष द्वारा कई बार आंदोलन किए गए, जहां स्ट्रीट लाइट का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। बावजूद इसके, हालात में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं देने से जनता में असंतोष बढ़ता नजर आ रहा है।
राजनीतिक गलियारों में अब यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या नगर परिषद प्रशासन केवल फाइलों और कागजों तक सीमित होकर रह गया है? नागरिकों का आरोप है कि अधिकारी और जिम्मेदार जनप्रतिनिधि वातानुकूलित केबिनों में बैठकर “सब ठीक है” की रिपोर्ट तैयार करते हैं, जबकि रात के समय क्षेत्र का वास्तविक दौरा किया जाए तो शहर की स्थिति कुछ और ही कहानी बयान करती है।
नगर परिषद के नियमों के अनुसार मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना स्थानीय प्रशासन और निर्वाचित प्रतिनिधियों की सामूहिक जिम्मेदारी मानी जाती है। मुख्याधिकारी प्रशासनिक प्रमुख होते हैं, जबकि नगराध्यक्ष, सभापति और संबंधित विभागीय अधिकारी विकास कार्यों की निगरानी और अमलबजावनी के लिए जवाबदेह माने जाते हैं। यदि चुनावी घोषणा पत्र में किए गए वादे समय पर पूरे नहीं होते, तो जनता को सवाल पूछने का अधिकार भी कानून और लोकतंत्र दोनों देते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी सत्ता पक्ष की असली परीक्षा चुनाव जीतने के बाद शुरू होती है। जनता केवल भाषण, बैनर और जाहिरनामे नहीं देखती, बल्कि पांच वर्षों में हुए वास्तविक कार्यों के आधार पर अपना निर्णय तय करती है। फिलहाल शहर में यह चर्चा तेज है कि सत्ता पक्ष अपने पहले ही वर्ष में बुनियादी सुविधाओं के मुद्दे पर संघर्ष करता दिखाई दे रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि दूसरे वर्ष में प्रवेश करने से पहले क्या सत्ता पक्ष अपने ही जाहिरनामे के दूसरे मुद्दे पर खरा उतर पाएगा? क्या शहर की सड़कों पर रोशनी आएगी या फिर यह वादा भी राजनीतिक जुमलेबाजी तक सीमित रह जाएगा?
आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि जनता की नाराजगी सही साबित होती है या सत्ता पक्ष अपने काम से विश्वास कायम कर पाता है। फिलहाल शहर की अंधेरी सड़कें सिर्फ रोशनी नहीं, बल्कि जवाब भी मांग रही हैं।
पार्ट.2…




