प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : घुग्घुस नगर परिषद द्वारा वर्षों से विभिन्न डायव्हर्टेड ले-आउट्स को अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) दिए जाने के बाद अब उन ले-आउट्स की वास्तविक स्थिति और नियमों के पालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। नगर परिषद की नियोजन, विकास समिति एवं सांस्कृतिक विभाग के सभापति रविश विनय सिंह ने मुख्याधिकारी को पत्र सौंपते हुए सभी NOC प्राप्त ले-आउट्स की “संयुक्त जांच मोहीम” तत्काल शुरू करने की मांग की है।
इस मांग ने नगर परिषद प्रशासन के कामकाज, विकास आराखड़ों के पालन और राजस्व वसूली को लेकर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। सवाल यह उठ रहा है कि जब NOC जारी किए गए थे, तब क्या प्रशासन ने नियमों की पूरी जांच की थी या केवल कागजी प्रक्रिया पूरी कर अनुमति प्रदान कर दी गई?
पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जिन ले-आउट्स को नगर परिषद ने अनुमति दी, वहां मंजूर विकास आराखड़े के अनुसार सड़कें, खुली जगह, नालियां, स्ट्रीट लाइट, सार्वजनिक सुविधाएं और अन्य मूलभूत व्यवस्थाएं वास्तव में तैयार हुई हैं या नहीं, इसकी कभी व्यापक भौतिक जांच नहीं हुई।
सभापति रविश विनय सिंह ने मांग की है कि नियोजन विभाग, बांधकाम विभाग, कर विभाग और पानीपुरवठा विभाग के संयुक्त समन्वय से विशेष जांच अभियान चलाया जाए। इसमें विशेष रूप से DP रोड के लिए छोड़ी गई जमीन, अतिक्रमण, अनधिकृत प्लॉटिंग, नकाशाबाह्य निर्माण तथा विकास शुल्क और करों की थकबाकी की भी जांच की जाए।
पत्र में यह भी मुद्दा उठाया गया है कि जिन बड़े ले-आउट्स में STP या Grey Water Treatment सिस्टम अनिवार्य था, वहां क्या वास्तव में ऐसे प्रकल्प कार्यरत हैं या केवल दस्तावेजों तक सीमित हैं। यदि ये प्रकल्प शुरू नहीं किए गए तो पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
राजनीतिक स्तर पर इस मांग को प्रशासनिक जवाबदेही से जोड़कर देखा जा रहा है। शहर में चर्चा है कि यदि संयुक्त जांच शुरू होती है तो कई पुराने मामलों, ले-आउट मंजूरियों और संभावित अनियमितताओं की परतें खुल सकती हैं।
सभापति ने 15 दिनों के भीतर विस्तृत जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने तथा नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर संबंधित ले-आउट धारकों पर कड़ी कार्रवाई करने की मांग की है। अब देखने वाली बात यह होगी कि नगर परिषद प्रशासन इस मांग को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या वास्तव में शहरभर में व्यापक जांच मोहीम शुरू होती है या यह मामला केवल पत्राचार तक सीमित रह जाता है।




