वादों की राजनीति या जमीनी हकीकत?
प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : चुनाव के दौरान हर राजनीतिक दल जनता के सामने बड़े-बड़े वादे और विकास के दावे पेश करता है। किसी ने रोजगार की बात की, किसी ने सड़क, स्वास्थ्य और मूलभूत सुविधाओं की। इसी क्रम में एक सत्ता पक्ष के जाहिरनामे में स्पष्ट रूप से यह घोषणा की गई थी कि “घुग्घुस शहरातील प्रत्येक घरात नळा द्वारे पाणीपुरवठा केल्या जाईल व शहराला वॉटर टँकर मुक्त केला जाईल.” साथ ही मतदाताओं से भारी बहुमत से विजयी करने की अपील भी की गई थी।
लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि चुनावी मंचों और कागजों में किए गए वादे आखिर जमीन पर कितने उतरे?
शहर में भीषण गर्मी के बीच नगर परिषद कार्यालय की ओर से हाल ही में नागरिकों को धूप से बचने, अधिक पानी पीने, पानीयुक्त फलों और द्रव पदार्थों के सेवन संबंधी संदेश प्रसारित किया गया। परंतु नागरिकों में चर्चा यह है कि जब शहर के अनेक क्षेत्रों में नियमित और स्वच्छ पानी ही उपलब्ध नहीं हो रहा, तब ऐसे संदेश आम लोगों के लिए कितने व्यावहारिक हैं?
महंगाई के दौर में हर परिवार बोतलबंद पानी, फिल्टर सिस्टम या अतिरिक्त जलस्रोत खरीदने में सक्षम नहीं है। कई घरों में नल तो लगे हैं, लेकिन समय पर पानी नहीं पहुंचता। कहीं बोरवेल सूख चुके हैं, तो कहीं टैंकरों पर निर्भरता बढ़ गई है। टैंकर से मिलने वाले पानी की गुणवत्ता को लेकर भी लोगों में शंका बनी हुई है कि वह पानी स्वच्छ है या किसी अस्वच्छ स्रोत से लाया जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल प्रशासनिक जवाबदेही का है। नगर परिषद के मुख्याधिकारी, नगराध्यक्ष, पानीपुरवठा बांधकाम सभापति, संबंधित इंजीनियर और सुपरवाइजर आखिर जमीनी स्थिति की वास्तविक मॉनिटरिंग कर रहे हैं या केवल फाइलों और रिपोर्टों में “सब कुछ व्यवस्थित” दर्शाया जा रहा है?
नगर परिषद अधिनियम और प्रशासनिक नियमों के अनुसार नागरिकों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना स्थानीय प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी मानी जाती है। पानी जैसी जीवनावश्यक सेवा में लापरवाही केवल प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि जनस्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है। यदि शहर को “टैंकर मुक्त” करने का सार्वजनिक वादा किया गया था, तो उस दिशा में कितनी पाइपलाइन बिछी, कितने जलस्रोत विकसित हुए, कितने क्षेत्रों में नियमित जलापूर्ति शुरू हुई और कितने करोड़ रुपये खर्च हुए — इसका सार्वजनिक लेखा-जोखा सामने आना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी घोषणापत्र केवल वोट लेने का माध्यम नहीं होना चाहिए, बल्कि वह जनता के साथ किया गया सार्वजनिक करार माना जाना चाहिए। यदि वादे पूरे नहीं होते, तो जनता को सवाल पूछने का संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार है।
शहर में फिलहाल ऐसी चर्चा है कि सत्ता पक्ष के कार्यकाल के पहले ही वर्ष में पानी संकट ने उनके पहले बड़े वादे की परीक्षा ले ली है। अब आने वाला दूसरा वर्ष यह तय करेगा कि यह केवल चुनावी जुमला था या वास्तव में प्रशासन कोई ठोस कदम उठाएगा।
आखिरकार अगले पांच वर्षों में जनता का विश्वास मजबूत होगा या राजनीति पर अविश्वास बढ़ेगा — इसका फैसला अब भाषणों से नहीं, बल्कि नलों में आने वाले पानी, सड़कों पर दिखने वाले काम और प्रशासनिक पारदर्शिता से होगा।
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