प्रणयकुमार बंडी
आज के दौर में सोशल मीडिया केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि छवि निर्माण का सबसे ताकतवर मंच बन चुका है। खासतौर पर सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनेताओं और समाजसेवकों के लिए यह मंच अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का प्रमुख जरिया बन गया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह मौजूदगी वास्तव में समाज के हित में काम करने की है, या फिर केवल अपनी छवि को चमकाने की एक होड़ है?
बार-बार वायरल होते निवेदन: मंशा पर सवाल
अक्सर देखा जाता है कि कुछ लोग किसी जनसमस्या, मुद्दे या विकास संबंधी मांग को लेकर संबंधित सरकारी विभाग में निवेदन पत्र देते हैं। यह एक अच्छी और सराहनीय पहल है, क्योंकि लोकतंत्र में जनहित की आवाज़ उठाना हर नागरिक का अधिकार है। लेकिन जब यही निवेदन पत्र बार-बार सोशल मीडिया पर वायरल किए जाने लगते हैं — कभी हफ्ते में एक बार, कभी हर निवेदन के बाद — तो इससे प्रश्न उठने लगते हैं कि क्या उद्देश्य वास्तव में समस्या का समाधान है, या केवल प्रसिद्धि प्राप्त करना?
“मैं ही पहला था” का भ्रम
जैसे ही कोई अन्य व्यक्ति उसी मुद्दे पर नया निवेदन देता है, कुछ लोग तुरन्त पुराने निवेदन पत्रों को दोबारा वायरल करना शुरू कर देते हैं, मानो वे यह दिखाना चाहते हों कि वही इस मुद्दे के ‘असली’ प्रतिनिधि हैं और बाकी सब ‘उनके बाद वाले’। इस मानसिकता के पीछे क्या है — आत्मप्रशंसा की लालसा, प्रतिस्पर्धा, या फिर यह साबित करने की जिद कि समाजसेवा केवल वही कर रहे हैं?
समाजसेवा या मानसिक भ्रम?
ऐसा व्यवहार कभी-कभी किसी मानसिक दबाव या पहचान के संकट को भी दर्शा सकता है। “मैं ही सबसे पहले था”, “मैंने ही सबसे पहले किया” — यह सोच कहीं न कहीं सामाजिक कार्य को व्यक्तिगत प्रसिद्धि की सीढ़ी बना देती है। यह समाज सेवा का ‘स्टंट’ नहीं तो और क्या है, जब उद्देश्य केवल प्रचार हो और समाधान गौण हो जाए।
छपास रोग और दिखावे की राजनीति
ऐसे मामलों में एक और बड़ा प्रश्न उठता है: क्या केवल निवेदन देना ही समाजसेवा है? या फिर निवेदन के पीछे कुछ और उद्देश्य छिपे होते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि निवेदन के बहाने गिट्टी, बोल्डर, पौधे की आपूर्ति या मशीन, ट्रैक्टर, वाहन जैसे सरकारी संसाधनों की मांग की जाती है? यदि नहीं, तो केवल मीडिया में आने और फोटो वायरल करने की यह “छपास की बीमारी” क्यों?
निष्कर्ष: असली सेवा दिखावे से परे होती है
समाज सेवा एक निस्वार्थ कार्य है, जो मौन रूप से भी किया जाए तो उसका असर होता है। बार-बार निवेदन वायरल करना, खुद को ‘एकमात्र कार्यकर्ता’ साबित करने की कोशिश करना, और दूसरों की पहल को नकारना — यह सब समाज सेवा के वास्तविक मर्म के विरुद्ध है।
समाज को आज ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो दिखावे के बिना कार्य करें, न कि सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए समाजसेवा का इस्तेमाल करें। वरना यह प्रश्न हमेशा बना रहेगा — “निवेदन के पीछे सेवा है या स्वार्थ?”





