नई दिल्ली — हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की दुनिया में तानसेन का नाम आज भी श्रद्धा और सम्मान से लिया जाता है। उनका पूरा नाम रामतनु पांडे था, लेकिन वे “तानसेन” के नाम से प्रसिद्ध हुए। वे उत्तर भारतीय संगीत परंपरा के महान स्तंभों में से एक माने जाते हैं।
तानसेन ने ध्रुपद शैली को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया और कई रागों की रचना की, जो आज भी शास्त्रीय संगीत की आत्मा बने हुए हैं। उनके गायन में एक अलौकिक शक्ति मानी जाती थी — कहा जाता है कि वे राग मेघ मल्हार से वर्षा और राग दीपक से दीप प्रज्वलित कर सकते थे।
तानसेन को मुगल सम्राट अकबर के नवरत्नों में शामिल किया गया था। उन्होंने न केवल दरबारी संगीत को समृद्ध किया, बल्कि गुरु हरिदास से प्राप्त ज्ञान को आगे बढ़ाकर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमूल्य धरोहर छोड़ दी।
आज भी देशभर के संगीत विद्यालयों, घरानों और मंचों पर तानसेन की विरासत जीवंत है। ग्वालियर में हर साल आयोजित होने वाला तानसेन संगीत समारोह उनकी स्मृति को समर्पित है, जहाँ भारत और विदेशों से आए कलाकार उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुति देते हैं।
तानसेन न केवल एक संगीतज्ञ थे, बल्कि वे भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के ऐसे स्तंभ हैं जिनकी गूँज आज भी सुरों के माध्यम से महसूस की जा सकती है।




