12th Day of Indefinite Hunger Strike: Sharp Questions Raised Over the Role of Politics, Administration and Company in Ghugus
लिखित निर्णय कब? मांगें मानेंगी नगर परिषद और निजी कंपनी या आंदोलन को ही दबा दिया जाएगा?
प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस/चंद्रपुर : घुग्घुस के शांति नगर स्थित बोधिसत्व बुद्ध विहार एवं ध्यान साधना केंद्र परिसर में भिक्खु रत्नमणि थेरो का आमरण उपोषण लगातार चर्चा का केंद्र बना हुआ है। 7 अगस्त 2026 को दोपहर 3 बजे से शुरू हुआ यह आंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। आंदोलनकारियों का कहना है कि नगर परिषद और संबंधित निजी कंपनी की ओर से उनकी मांगों पर अब तक कोई ठोस एवं लिखित निर्णय नहीं दिया गया है।
उपोषण के दौरान 17 अगस्त को 11वां दिन होने का दावा किया गया। इसी बीच सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और स्थानीय चर्चाओं ने नगर परिषद, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों तथा संबंधित कंपनी की भूमिका को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि इन वायरल दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

पुलिस की मौजूदगी में अस्पताल पहुंचाए गए भिक्खु रत्नमणि थेरो
देर शाम उपोषण स्थल से भिक्खु रत्नमणि थेरो को पुलिस की मौजूदगी में चंद्रपुर के चिकित्सालय ले जाया गया। आरोप है कि जिस निजी कंपनी और नगर प्रशासन की कार्यप्रणाली के विरोध में आंदोलन चल रहा है, उसी कंपनी की फाउंडेशन से जुड़ी एम्बुलेंस का उपयोग उन्हें अस्पताल पहुंचाने के लिए किया गया।
यही घटनाक्रम अब कई सवालों को जन्म दे रहा है—यदि आंदोलनकारी की तबीयत बिगड़ी थी तो प्रशासन की जिम्मेदारी क्या थी? क्या आंदोलन के मूल मुद्दों पर कोई ठोस कार्रवाई हुई? और यदि किसी पक्ष की लापरवाही या नियमों का उल्लंघन सामने आता है, तो उसकी जांच कौन करेगा?
मामला सिर्फ उपोषण का नहीं, जवाबदेही का भी
परिसर में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर प्रशासन कब तक सिर्फ चर्चा और आश्वासन तक सीमित रहेगा? नेता आएंगे, अधिकारी आएंगे, बैठकें होंगी, आश्वासन दिए जाएंगे—लेकिन क्या आंदोलन की मूल मांगों पर कोई लिखित आदेश जारी होगा?
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि क्या जनप्रतिनिधि और अधिकारी आंदोलन स्थल पर पहुंचकर पुराने निर्णयों और प्रक्रियाओं की समीक्षा करेंगे? क्या नगर परिषद अपने स्तर पर लिए गए निर्णयों को नियम-कानून की कसौटी पर दोबारा जांचेगी? और क्या संबंधित कंपनी भी विवाद के समाधान के लिए आगे आएगी? इन सवालों का जवाब अब घुग्घुस की जनता जानना चाहती है।
‘मानहानि’ के नोटिस का डर दिखाकर आवाजें नहीं रुकेंगी?
आंदोलन से जुड़े मुद्दे को लेकर परिसर में एक और तीखी चर्चा सामने आ रही है। सवाल उठाया जा रहा है कि यदि कोई नागरिक कंपनी अथवा प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, तो क्या उसके सामने कानूनी नोटिस और मानहानि के दावे खड़े किए जाएंगे?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सवाल पूछना नागरिकों का अधिकार है। वहीं किसी व्यक्ति या संस्था पर लगाए गए आरोपों की सत्यता भी प्रमाण और जांच से ही तय होनी चाहिए। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि आरोप-प्रत्यारोप के बजाय संबंधित पक्ष दस्तावेजों और आधिकारिक निर्णयों के साथ जनता के सामने अपना पक्ष रखें।
तीन प्रमुख मांगों पर टिकी निगाहें
बोधिसत्व बुद्ध विहार एवं ध्यान साधना केंद्र की ओर से प्रमुख रूप से तीन मांगें सामने रखी गई हैं—
- बौद्ध विहार के सामने का रोड/परिसर विहार के उपयोग के लिए खाली कराया जाए।
- नगर परिषद द्वारा दी गई NOC को रद्द किया जाए।
- बौद्ध विहार परिसर को स्थायी रूप से विहार समिति को सौंपा जाए। अब असली सवाल यह है कि इन मांगों पर लिखित और स्पष्ट निर्णय कब होगा?
आंदोलन खत्म होगा या सवाल और गहरे होंगे?
घुग्घुस में यह मामला अब केवल एक व्यक्ति के आमरण उपोषण तक सीमित नहीं रह गया है। यह मामला प्रशासनिक निर्णय, नगर परिषद की भूमिका, निजी कंपनी के साथ स्थानीय संबंधों, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और नागरिकों के अधिकारों से जुड़े सवालों को सामने ला रहा है।
यदि मांगें उचित हैं तो उनका समाधान दस्तावेजों और कानून के अनुसार होना चाहिए। यदि मांगें नियमों के अनुरूप नहीं हैं, तो प्रशासन को उसका स्पष्ट कानूनी आधार जनता के सामने रखना चाहिए।
लेकिन मौन, टालमटोल और केवल आश्वासन से विवाद समाप्त नहीं होगा।
अब घुग्घुस की निगाहें इस बात पर हैं कि प्रशासन और नगर परिषद क्या कोई ठोस, पारदर्शी और लिखित फैसला सामने लाते हैं या फिर यह आंदोलन भी आश्वासनों की फाइलों में दबकर रह जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या भिक्खु रत्नमणि थेरो के आमरण उपोषण का समाधान निकलेगा, या यह आंदोलन भी घुग्घुस की राजनीति और प्रशासनिक उदासीनता का एक और अध्याय बनकर रह जाएगा?




