(प्रणयकुमार बंडी)
घुग्घुस, चंद्रपुर — नगर परिषद चुनाव आते ही घुग्घुस में टेंपरेरी रोजगार का महोत्सव शुरू हो जाता है। पोस्टर लगाने वाले से लेकर रैलियों में भीड़ जुटाने वालों तक, हर किसी को कुछ न कुछ काम मिल ही जाता है। लेकिन जैसे ही वोटिंग खत्म होती है, यही लोग फिर उसी बेरोजगारी के अंधेरे में धकेल दिए जाते हैं। बड़ा सवाल यह है कि जब नेता चुनावी मौसम में रोजगार दे सकते हैं, तो स्थाई रोजगार दिलाने की मांग ये युवा पूरे साल क्यों नहीं करते?
स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में आरोप यह भी है कि कई उम्मीदवार “आपको हमारी जरूरत है — इसलिए मदद, पैसे दो” वाली मानसिकता से काम कर रहे हैं। यह भूमिका न सिर्फ स्थानिक राजनीति के समीकरण बिगाड़ती है बल्कि उन निस्वार्थ उम्मीदवारों पर भी प्रश्नचिन्ह लगाती है जो ईमानदारी से चुनाव लड़ना चाहते हैं।
सबसे बड़ा सवाल तो चुनाव आयोग की ओर मुड़ता है — क्या विभाग ऐसे पैसों के खेल, प्रलोभन और खरीद-फरोख्त पर निगरानी रख रहा है, या फिर आँखें मूँदकर चुनाव चरित्रहीनता को खुली छूट दे रहा है? ज़मीन पर फैल रही चर्चाएँ बताती हैं कि कई जगह निरीक्षण सिर्फ कागज़ों में हो रहा है, ज़मीनी कार्रवाई कहीं नज़र नहीं आ रही।
हालाँकि, सभी उम्मीदवार एक जैसे नहीं हैं। कुछ उम्मीदवार गांधीगिरी, सादगी, साफ-सुथरे प्रचार और विदेशों में अपनाए जाने वाले प्रोफेशनल कैंपेनों की तरह काम कर रहे हैं—बिना पैसों के खेल, बिना भीड़ खरीदने की कोशिश, और सिर्फ समस्याओं को हल करने के इरादे के साथ।
लेकिन बड़ा प्रश्न जनता पर भी है —
क्या वे बड़े नेताओं, छोटे नेताओं, और युवा उम्मीदवारों में भेदभाव करेंगे? या अपने भविष्य को बदलने की जिम्मेदारी समझकर ईमानदार विकल्प चुनेंगे? या फिर पुरानी दुश्मनियों, जात-पांत, पार्टी की जड़ता, और नेताओं द्वारा जानबूझकर पैदा की गई उलझनों में ही फँसे रहेंगे?
इन सवालों का जवाब 02 दिसंबर की वोटिंग और 03 दिसंबर 2025 को आने वाले नतीजे ही देंगे। लेकिन इतना तय है — अगर जनता उसी लालच, उसी झूठे रोजगार और उसी प्रलोभन में फिर फँसी, तो चुनाव बदलेंगे, उम्मीदवार बदलेंगे… पर घुग्घुस का भविष्य नहीं बदलेगा।




