(प्रणयकुमार बंडी)
भारत जैसे विविधतापूर्ण लोकतंत्र में जहां धर्मनिरपेक्षता संविधान की आत्मा कही जाती है, वहीं आज एक असहज प्रश्न फिर से उठ खड़ा हुआ है — क्या मुसलमान सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गए हैं? राजनीतिक दलों के मंचों पर “समावेशिता” और “समान अवसर” की बातें तो खूब होती हैं, लेकिन जब टिकट वितरण की बारी आती है, तो मुस्लिम उम्मीदवारों के हिस्से में केवल निराशा ही आती है।
चुनावों में बढ़ती उपेक्षा का पैटर्न
आगामी महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले की घुग्घुस नगर परिषद चुनाव हो या देश के किसी भी राज्य का स्थानीय निकाय चुनाव, तस्वीर लगभग एक-सी दिखती है। विविध राजनीतिक दलों को मुस्लिम मत तो चाहिए, लेकिन नेतृत्व सौंपने से परहेज है। यह विरोधाभास केवल चुनावी गणित का परिणाम नहीं बल्कि एक गहरी मानसिकता का द्योतक है — मुसलमानों को सिर्फ ‘वोट बैंक’ के रूप में देखने की मानसिकता।
सेक्युलरिज़्म का मुखौटा और स्थानीय राजनीति की सच्चाई
अपने को सेक्युलर कहने वाले दल भी जब स्थानीय स्तर पर टिकट बांटते हैं, तो अक्सर मुस्लिम उम्मीदवारों को हाशिये पर रख देते हैं। “अल्पसंख्यक सेल” बनाकर दिखावटी प्रतिनिधित्व की कोशिश की जाती है, परंतु ये सेल ज़्यादातर मूकदर्शक बनकर रह जाते हैं। मुसलमानों को सलाहकार या समिति सदस्य तक सीमित रखकर वास्तविक नेतृत्व से दूर किया जा रहा है।
सत्ता की सीढ़ी पर ताले क्यों?
लोकतंत्र की बुनियाद प्रतिनिधित्व पर टिकी है, और जब किसी समुदाय को केवल समर्थन के लिए इस्तेमाल किया जाए, तो लोकतंत्र अधूरा रह जाता है। यह प्रश्न आज मुस्लिम समाज के सामने है — क्या वे अपने हक की आवाज़ खुद बुलंद करेंगे? क्या वे नेतृत्व की दिशा में कदम बढ़ाएंगे या फिर हर चुनाव में दूसरों की झोली भरने तक सीमित रहेंगे?
राजनीतिक दलों का दोहरा चेहरा
मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए इफ्तार पार्टियों, नमाज़ स्थलों के दौरे और भावनात्मक भाषणों की परंपरा पुरानी है। लेकिन वही दल टिकट देने के वक्त आंकड़ों और बहुमत की राजनीति का हवाला देते हैं। नतीजा यह होता है कि जो समुदाय संख्या और मतदान में सक्रिय रहता है, वह निर्णय-निर्माण की मेज से दूर रखा जाता है।
आवश्यक है आत्मचिंतन और आत्मनिर्णय
अब समय है कि मुस्लिम समाज स्वयं अपनी राजनीतिक दिशा तय करे। किसी पार्टी का “वोट बैंक” बनने से बेहतर है कि वह खुद अपना “वोट वैल्यू” समझे और उसे नेतृत्व में बदले। जब तक राजनीतिक हिस्सेदारी वास्तविक नहीं होगी, तब तक समाज का प्रतिनिधित्व भी अधूरा रहेगा।
आज घुग्घुस नगर परिषद चुनाव के संदर्भ में उठी यह बहस केवल एक नगर या जिले की नहीं है — यह सवाल पूरे देश के लिए आईना है। राजनीतिक दलों को तय करना होगा कि वे मुसलमानों को नागरिक समझते हैं या केवल चुनावी गणित का हिस्सा। और मुस्लिम समाज को भी ठानना होगा कि वे अपनी आवाज़ किसी और के घोषणापत्र में ढूंढेंगे या अपने नेतृत्व के माध्यम से खुद तय करेंगे।




