दीक्षित तालाब के पुनर्जीवन पर आपत्ति, वेकोलि तालाब की जमीन के स्वामित्व और निविदा की शर्तों में कथित अनियमितताओं की जांच की मांग
प्रणयकुमार बंडी
घुग्घूस, चंद्रपुर: घुग्घूस नगर परिषद की ओर से अमृत योजना के अंतर्गत तालाबों के पुनर्जीवन और संबंधित कार्यों के लिए लगभग ₹7.09 करोड़ की निविदा प्रक्रिया शुरू किए जाने पर सवाल उठाए गए हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं इबादुल सिद्दीकी और अंजय्या राजम अनपर्ती ने 15 अक्टूबर 2026 को नगर परिषद के मुख्याधिकारी को लिखित शिकायत सौंपकर निविदा प्रक्रिया तत्काल रोकने और उसे रद्द करने की मांग की है। शिकायत की प्रतियां संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को भी भेजी गई हैं।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि निविदा तैयार करने और प्रकाशित करने की प्रक्रिया में नियमों, तकनीकी शर्तों, पारदर्शिता तथा अमृत योजना के प्रावधानों का कथित रूप से उल्लंघन हुआ है। उन्होंने पूरे मामले की जांच कराकर सार्वजनिक निधि का उपयोग शहर की वास्तविक जरूरतों के अनुसार करने की मांग की है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है।

दीक्षित तालाब के बजाय वेकोलि तालाब पर काम प्रस्तावित करने का आरोप
शिकायत में घुग्घूस के तीन प्रमुख तालाबों का उल्लेख किया गया है। इनमें बाजार क्षेत्र का मध्यवर्ती दीक्षित तालाब, वेकोलि की बंद पड़ी खदान के पास स्थित तालाब और शास्त्रीनगर तालाब शामिल हैं।
शिकायतकर्ताओं के अनुसार, दीक्षित तालाब शहर के बीच स्थित होने के कारण नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए उसके पुनर्जीवन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी। उनका आरोप है कि दीक्षित तालाब की स्थिति और जमीन के स्वामित्व की जांच किए बिना वेकोलि क्षेत्र के तालाब को प्रस्तावित कार्य में शामिल किया गया।
शिकायत में यह भी दावा किया गया है कि वेकोलि तालाब की जमीन निजी स्वामित्व से संबंधित है और उसके सातबारा अभिलेख में तालाब के रूप में स्पष्ट उल्लेख नहीं है। दूसरी ओर, दीक्षित तालाब के राजस्व अभिलेख में तालाब का उल्लेख होने की बात कही गई है। शिकायतकर्ताओं ने संबंधित सातबारा अभिलेखों के आधार पर जमीन के स्वामित्व, उपयोग और परियोजना की पात्रता की जांच की मांग की है।
उनका कहना है कि यदि संबंधित जमीन वेकोलि के स्वामित्व या नियंत्रण में है, तो वहां काम कराने से पहले जमीन की उपलब्धता, आवश्यक अनुमतियों और संबंधित संस्था की जिम्मेदारी स्पष्ट होनी चाहिए।

निविदा की शर्तों पर भी उठाए सवाल
शिकायत में निविदा दस्तावेजों की कई तकनीकी और प्रशासनिक शर्तों पर आपत्ति दर्ज की गई है। इनमें प्रमुख रूप से कुछ मुद्दे उठाए गए हैं:
- अनुभव की शर्त: शिकायतकर्ताओं के अनुसार, पांच वर्षों में एक ही कार्य का कम-से-कम 60 प्रतिशत मूल्य के बराबर अनुभव मांगने वाली शर्त प्रतिस्पर्धा सीमित कर सकती है।
- महत्वपूर्ण तारीखों का अभाव: निविदा दस्तावेजों में प्रकाशन, प्री-बिड बैठक, आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि और निविदा खोलने की तारीख स्पष्ट नहीं होने का आरोप लगाया गया है।
- ब्रांड और OEM संबंधी शर्तें: कुछ तकनीकी उपकरणों के लिए विशिष्ट अनुमोदित विक्रेताओं तथा निर्माता प्राधिकरण प्रमाणपत्र से जुड़ी शर्तों को लेकर आपत्ति जताई गई है।
- तकनीकी विसंगतियां: पंजीकरण श्रेणी, सुरक्षा जमा की वैधता, नेटवर्थ की शर्तों और पात्रता संबंधी बिंदुओं में विरोधाभास होने का दावा किया गया है।
- कार्य पूर्ण करने की अवधि: शिकायत के अनुसार, निविदा में कार्य पूरा करने की निश्चित समयसीमा स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है, जबकि बड़े सार्वजनिक कार्यों में समयसीमा महत्वपूर्ण होती है।
शिकायतकर्ताओं ने इन बिंदुओं की जांच केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC), सार्वजनिक निर्माण विभाग के लागू दिशा-निर्देशों और संबंधित सरकारी नियमों के अनुरूप कराने की मांग की है। इन आपत्तियों पर संबंधित अधिकारियों की आधिकारिक प्रतिक्रिया अभी सामने नहीं आई है।
नगरसेवकों और वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि परियोजना की रूपरेखा, तालाब के चयन, जमीन की उपलब्धता, लागत के विवरण और निविदा की शर्तों से संबंधित पर्याप्त जानकारी नगरसेवकों के सामने नहीं रखी गई। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि निविदा जमा करने की अंतिम तारीख से ठीक पहले नगरसेवकों को इसकी जानकारी मिलने से आपत्तियों और सुझावों पर विचार करने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला।
उन्होंने यह भी कहा कि परियोजना प्रबंधन सलाहकार की नियुक्ति तथा निविदा प्रक्रिया आगे बढ़ाने से पहले आवश्यक प्रशासनिक और सक्षम प्राधिकारी की मंजूरियों की स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।
शिकायतकर्ताओं ने मांग की है कि नगर परिषद की ओर से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं और सभी आपत्तियों की जांच के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाए।

जमीन की उपलब्धता और फंड के उपयोग पर भी स्पष्टीकरण मांगा
शिकायत में कहा गया है कि अमृत योजना के अंतर्गत तालाब पुनर्जीवन के साथ सीवरेज और संबंधित कार्यों के लिए जमीन की उपलब्धता तथा आवश्यक अनुमतियां स्पष्ट होना जरूरी है। शिकायतकर्ताओं ने वेकोलि तालाब और शास्त्रीनगर तालाब के स्वामित्व, रखरखाव और सीवरेज व्यवस्था की जिम्मेदारी तय करने की मांग की है।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया है कि यदि वेकोलि की जमीन या संबंधित क्षेत्र में काम प्रस्तावित है, तो उपलब्ध नियमों के अनुसार वेकोलि से संबंधित निधि अथवा सामाजिक उत्तरदायित्व मद से कार्य कराने की संभावनाओं की जांच की जाए। साथ ही, अमृत योजना के लिए स्वीकृत राशि का उपयोग घुग्घूस शहर की व्यापक जनहित संबंधी जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाए।
शिकायतकर्ताओं की चार प्रमुख मांगें 1. लगभग ₹7.09 करोड़ की संबंधित निविदा प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाकर कथित अनियमितताओं की जांच होने तक उसे रद्द किया जाए।
2. दीक्षित तालाब के स्वामित्व, स्थिति और पुनर्जीवन की जरूरत का परीक्षण कर जनहित में उसके पुनर्जीवन पर प्राथमिकता से विचार किया जाए।
3. वेकोलि तालाब और शास्त्रीनगर तालाब की जमीन, स्वामित्व, सीवरेज व्यवस्था तथा संबंधित कार्यों की जिम्मेदारी स्पष्ट की जाए।
4. स्वीकृत निधि को घुग्घूस शहर की जरूरतों के अनुरूप रखते हुए स्थानीय नागरिकों, नगरसेवकों, पर्यावरण विशेषज्ञों और संबंधित हितधारकों से चर्चा कर संशोधित एवं समावेशी प्रस्ताव तैयार किया जाए।

अब प्रशासन के निर्णय पर नजर
शिकायतकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि यदि निविदा प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई, तो वे न्यायालय का दरवाजा खटखटाने सहित अन्य कानूनी विकल्प अपनाने पर विचार करेंगे। उन्होंने प्रशासन से मामले को गंभीरता से लेकर निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
अब देखना होगा कि घुग्घूस नगर परिषद और संबंधित वरिष्ठ अधिकारी इन आरोपों तथा तकनीकी आपत्तियों पर क्या रुख अपनाते हैं। फिलहाल, निविदा में कथित अनियमितताओं, तालाबों के स्वामित्व और परियोजना की पात्रता से जुड़े सवालों पर प्रशासनिक स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण होगा।




