प्रणयकुमार बंडी
घुग्घुस, चंद्रपुर : घुग्घुस शहर की जनता पिछले कई वर्षों से रेलवे गेट जाम की गंभीर समस्या से परेशान है। रोजाना घंटों तक बंद रहने वाले रेलवे फाटक के कारण विद्यार्थियों, मजदूरों, व्यापारियों, मरीजों और आम नागरिकों को भारी मानसिक व शारीरिक परेशानी झेलनी पड़ रही है। इसी समस्या के समाधान के लिए वर्ष 2014 के आसपास रेलवे उड्डाण पुल (पुलिया) निर्माण की प्रारंभिक प्रक्रिया शुरू की गई थी। लेकिन, 2026 का मई महीना आ जाने के बाद भी पुल का निर्माण कार्य अधूरा ही दिखाई दे रहा है।
शहरवासियों का कहना है कि शासन और प्रशासन ने इस महत्वपूर्ण परियोजना को गंभीरता से लेने के बजाय केवल आश्वासनों का पुल खड़ा किया। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद जनता आज भी जाम में फंसी हुई है। निर्माण कार्य की धीमी गति और लगातार हो रही देरी पर अब लोगों में तीव्र नाराजगी दिखाई देने लगी है।
दिनांक 09 मई 2026 को चंद्रपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक द्वारा पुल का निरीक्षण किया गया। निरीक्षण के कुछ ही घंटों बाद शाम से पुल पर भारी वाहनों को खड़ा कर टेस्टिंग शुरू किए जाने के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने लगे। इन वीडियो के बाद शहर में नई चर्चा शुरू हो गई है कि जब पुल परीक्षण के लिए उपयोग में लाया जा सकता है, तो आम जनता के लिए आखिर क्यों नहीं खोला जा रहा?
नागरिकों का कहना है कि घुग्घुस बस स्टॉप परिसर में बिना किसी बड़े उद्घाटन या लोकार्पण कार्यक्रम के बसों की आवाजाही शुरू कर दी गई थी। उसी तर्ज पर इस पुलिया को भी तत्काल जनता के लिए खोला जाए, ताकि दुपहिया, चार पहिया, छह चाकी वाहनों सहित आम लोगों को रोजाना होने वाली यातना से राहत मिल सके।
शहर में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि यदि अगले 10 दिनों के भीतर पुल का लोकार्पण नहीं किया गया अथवा जनता के उपयोग के लिए इसे नहीं खोला गया, तो सामाजिक गतिविधियों से जुड़े कार्यकर्ता आंदोलनात्मक भूमिका अपनाने की तैयारी में हैं। सूत्रों के अनुसार RTI आवेदन, निवेदन, प्रशासनिक अर्ज, पुलिस शिकायत, रेल रोको, चक्काजाम जैसे आंदोलनों के साथ-साथ “मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न” तथा “स्वदोष मानव हत्या” जैसे गंभीर मुद्दों को लेकर भी कानूनी पहल करने पर विचार किया जा रहा है।
नागरिकों का आरोप है कि वर्षों से अधूरा पड़ा यह पुल केवल सरकारी फाइलों और निरीक्षण दौरों तक सीमित होकर रह गया है। जबकि जनता रोजाना धूल, जाम, दुर्घटना और आर्थिक नुकसान का सामना कर रही है। सवाल यह भी उठ रहा है कि आखिर इस परियोजना में देरी का जिम्मेदार कौन है? संबंधित विभाग, ठेकेदार, रेलवे प्रशासन, या फिर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी?
अब पूरे शहर की नजर शासन और प्रशासन की आगामी भूमिका पर टिकी हुई है। क्या जनता को जल्द राहत मिलेगी, या फिर यह पुल भी केवल निरीक्षण, आश्वासन और वायरल वीडियो तक सीमित रह जाएगा — यही सबसे बड़ा सवाल बन चुका है।




