Friday, May 8, 2026

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“दीवार बनी आईना, बदली सोच” — खुले में पेशाब रोकने के लिए मैसूर का अनोखा प्रयोग बना मिसाल

कर्नाटक : भारत के अधिकांश शहरों में स्वच्छता आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। सड़क किनारे, खाली दीवारों के पास और सार्वजनिक स्थानों पर खुले में पेशाब करना आम दृश्य बन चुका है। इससे न केवल गंदगी और दुर्गंध फैलती है, बल्कि महिलाओं, बच्चों और आम नागरिकों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ता है। कई बार प्रशासन शौचालय बनाता है, चेतावनी बोर्ड लगाता है, जुर्माने की घोषणा करता है, लेकिन समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है। ऐसे में कर्नाटक के मैसूर शहर से एक ऐसी पहल सामने आई है, जिसने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

मैसूर सिटी कॉर्पोरेशन ने खुले में पेशाब रोकने और सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ बनाए रखने के लिए एक अनोखा प्रयोग शुरू किया है। शहर के सेंट्रल बस स्टैंड के पास खाली दीवारों पर स्टेनलेस स्टील की चमकदार शीट्स लगाई गई हैं, जो बिल्कुल शीशे जैसी दिखाई देती हैं। करीब 80 मीटर लंबी इस “रिफ्लेक्टिव वॉल” के सामने कोई भी व्यक्ति खुले में पेशाब करने से पहले खुद को साफ-साफ देख सकता है। यही मनोवैज्ञानिक प्रभाव लोगों को रुकने और शर्म महसूस कराने का काम कर रहा है।

यह पहल केवल दीवार सजाने का काम नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता बदलने का प्रयास है। प्रशासन का मानना है कि केवल दंड और नियमों से स्वच्छता नहीं लाई जा सकती, जब तक नागरिक स्वयं जिम्मेदारी महसूस न करें। यही कारण है कि यह प्रयोग लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है और सोशल मीडिया पर भी इसकी खूब सराहना हो रही है।

कई लोगों ने इस पहल को “स्मार्ट स्वच्छता अभियान” बताया है। लोगों का कहना है कि यदि हर शहर में ऐसी रचनात्मक सोच अपनाई जाए, तो सार्वजनिक गंदगी और बदबू जैसी समस्याओं में काफी कमी लाई जा सकती है। खासकर महिलाओं और परिवारों के लिए सार्वजनिक स्थान अधिक सुरक्षित और सम्मानजनक बन सकते हैं।

विशेषज्ञों का भी मानना है कि स्वच्छता केवल सफाई कर्मचारियों या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब तक लोग सार्वजनिक स्थानों को अपनी संपत्ति समझकर व्यवहार नहीं करेंगे, तब तक शहर पूरी तरह स्वच्छ नहीं बन सकते।

मैसूर की यह पहल एक संदेश देती है कि समाज को बदलने के लिए हमेशा बड़े बजट की जरूरत नहीं होती, बल्कि नई सोच और व्यवहारिक समाधान भी बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। अब सवाल यह है कि क्या देश के अन्य शहर भी इस तरह की सकारात्मक और रचनात्मक पहल अपनाने की हिम्मत दिखाएंगे?

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Pranaykumar Bandi

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